
ST.News Desk
आज के दौर में रिश्तों की कोई पक्की गारंटी नहीं रह गई है। कब कौन, कहां और किस मोड़ पर धोखा दे दे—इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है। इसी असुरक्षा के बीच एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है—बैकअप पार्टनर। यानी ऐसा व्यक्ति, जिसे लोग अपने मौजूदा रिश्ते के टूटने या मन न लगने की स्थिति में एक विकल्प के तौर पर संभालकर रखते हैं। यह दावा सिर्फ अनुभवों पर नहीं, बल्कि एक हालिया रिसर्च पर आधारित है, जिसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं।

रिसर्च में क्या सामने आया?
अमेरिका में 1200 से ज्यादा लोगों पर किए गए एक सर्वे में पाया गया कि कमिटेड रिश्ते में रहने वाले 16 फीसदी लोग ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं, जिसके लिए वे मौका मिलने पर अपने मौजूदा पार्टनर को छोड़ सकते हैं। ये कोई दूर के सेलेब्रिटी क्रश नहीं, बल्कि आसपास मौजूद असली लोग हैं—दोस्त, सहकर्मी या जान-पहचान वाले।
सर्वे के मुताबिक,
- 19 फीसदी पुरुषों ने बैकअप पार्टनर होने की बात मानी
- जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 12 फीसदी रहा
यह अंतर भले ही चौंकाता हो, लेकिन यह आज की डेटिंग दुनिया में मौजूद असुरक्षा और अनिश्चितता को भी साफ तौर पर दिखाता है।
‘सोलमेट’ की अवधारणा पर भी सवाल
इसी सर्वे में एक और अहम बात सामने आई। हर 5 में से 1 व्यक्ति ने माना कि वह अपने मौजूदा पार्टनर को “द वन” या सोलमेट नहीं मानता। खासतौर पर महिलाओं में यह सोच थोड़ी ज्यादा देखने को मिली।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सिचुएशनशिप, रेड फ्लैग्स और बार-बार टूटते भरोसे के इस दौर में खुद को पूरी तरह किसी एक इंसान के सामने खोलना कई लोगों को जोखिम भरा लगता है। ऐसे में बैकअप का ख्याल एक तरह का भावनात्मक सुरक्षा कव बन जाता है।
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
रिलेशनशिप विशेषज्ञों के अनुसार, बैकअप पार्टनर की कल्पना अक्सर इस बात का संकेत होती है कि रिश्ते में कहीं न कहीं कमी महसूस हो रही है—चाहे वह उत्साह हो, जुनून हो या नयापन। उनका कहना है कि अपने मौजूदा रिश्ते की तुलना किसी कल्पना या क्रश से करना असल में समस्याओं से बचने की आदत को दर्शाता है। क्रश हमें यह दिखाते हैं कि हम रिश्ते में क्या मिस कर रहे हैं, लेकिन उनके पीछे भागना कई बार भावनात्मक जाल बन सकता है।
क्या मॉडर्न डेटिंग ने इस सोच को बढ़ाया है?
आज की डेटिंग कल्चर में दूरी बनाए रखना जैसे नया ट्रेंड बन गया है। ज्यादा जुड़ाव, ज्यादा मेहनत और भावनाओं को खुलकर जाहिर करना अब “कूल” नहीं माना जाता।
लोग विकल्प खुले रखना ज्यादा सुरक्षित और आसान समझते हैं। यही सोच बेंचिंग जैसे कॉन्सेप्ट को जन्म देती है—जिसमें कोई व्यक्ति दूसरे को मैसेज, फ्लर्ट या कभी-कभार मिलने के जरिए दिलचस्पी में बनाए रखता है, लेकिन पूरी तरह कमिट नहीं होता।
इस स्थिति में सामने वाला भावनात्मक तौर पर जुड़ा रहता है, जबकि मुख्य रिश्ता तब तक चलता रहता है, जब तक वह टूट न जाए।
रिश्तों का नया सच
बैकअप पार्टनर का चलन इस बात का संकेत है कि आज के रिश्ते सिर्फ प्यार पर नहीं, बल्कि डर, असुरक्षा और विकल्पों की सोच पर भी टिके हैं। सवाल यही है—क्या यह खुद को बचाने की रणनीति है, या फिर रिश्तों को और खोखला करने का तरीका?
मॉडर्न रिलेशनशिप कल्चर
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