crossorigin="anonymous"> क्या अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की “इजाज़त” दी? सोशल मीडिया के दावे और असली भू-राजनीतिक सच्चाई - Sanchar Times

क्या अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की “इजाज़त” दी? सोशल मीडिया के दावे और असली भू-राजनीतिक सच्चाई

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हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक दावा तेजी से फैल रहा है कि अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की “इजाजत” दी है। इसे इस तरह पेश किया जा रहा है मानो अब भारत की ऊर्जा नीति वॉशिंगटन तय करता हो। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार यह दावा भ्रामक है और वैश्विक तेल बाजार, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था की गलत समझ से पैदा हुआ है।

राजीव सिन्हा
मुख्य संपादक
(संचार टाइम्स)

सोशल मीडिया पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि PM Narendra Modi के नेतृत्व वाली भारतीय सरकार रूसी तेल केवल इसलिए खरीद पा रही है क्योंकि अमेरिका ने इसकी अनुमति दी है। लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है।

यह भ्रम मुख्य रूप से United States Department of the Treasury के तहत काम करने वाली संस्था Office of Foreign Assets Control (OFAC) द्वारा जारी एक अस्थायी लाइसेंस, जनरल लाइसेंस 133, की गलत व्याख्या से पैदा हुआ है। इस लाइसेंस को सोशल मीडिया पर इस तरह पेश किया गया जैसे अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी हो, जबकि ऐसा नहीं है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद तेल बाजार में बदलाव

2022 में Russia-Ukraine War के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए। यूरोप ने रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करने का फैसला किया। लेकिन रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक है, इसलिए उसके तेल की आपूर्ति अचानक रुक जाती तो वैश्विक बाजार में भारी संकट पैदा हो सकता था।

इसी जोखिम से बचने के लिए G7 देशों ने Russian Oil Price Cap Mechanism लागू किया। इसके तहत पश्चिमी कंपनियां रूसी तेल की ढुलाई, बीमा या वित्तीय सेवाएं तभी दे सकती हैं जब तेल तय कीमत सीमा से नीचे बेचा जाए। इसका उद्देश्य यह था कि वैश्विक आपूर्ति बनी रहे, लेकिन रूस की कमाई सीमित हो।

भारत और चीन बने बड़े खरीदार

यूरोप के पीछे हटने के बाद रूस ने अपने तेल के लिए नए बाजार तलाशे। इस दौरान India और China जैसे एशियाई देश प्रमुख खरीदार बनकर उभरे।

भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ऐसे में जब रूस ने वैश्विक कीमतों से कम दर पर कच्चा तेल ऑफर किया तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह आर्थिक रूप से फायदेमंद सौदा था। भारत ने इस कच्चे तेल को रिफाइन कर डीजल और एविएशन फ्यूल जैसे उत्पाद तैयार किए और उन्हें वैश्विक बाजार—यहां तक कि यूरोप—को भी निर्यात किया।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुसार, एक बार कच्चा तेल किसी देश में रिफाइन हो जाता है तो वह उत्पाद उसी देश का माना जाता है। इसी कारण कुछ विश्लेषक इसे “रिफाइनिंग लूपहोल” कहते हैं, हालांकि यह पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया है।

30 दिन का अमेरिकी लाइसेंस क्या है?

OFAC द्वारा जारी 30 दिन का जनरल लाइसेंस 133 असल में पश्चिमी शिपिंग, बीमा और वित्तीय कंपनियों से जुड़ा है। रूस पर लगे प्रतिबंधों के कारण इन कंपनियों की वैश्विक ऊर्जा व्यापार में भागीदारी सीमित हो गई थी।

इस अस्थायी लाइसेंस का उद्देश्य कुछ परिस्थितियों में इन पश्चिमी कंपनियों को सीमित अवधि के लिए रूसी तेल से जुड़े लेनदेन में शामिल होने की अनुमति देना था, ताकि वैश्विक सप्लाई चेन बाधित न हो। इसका भारत या किसी अन्य देश को तेल खरीदने की अनुमति देने से कोई संबंध नहीं है।

भारत की ऊर्जा नीति

भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हित और आर्थिक जरूरतों पर आधारित है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता होने के कारण भारत को सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करनी पड़ती है।

भारतीय नीति-निर्माताओं का कहना है कि भारत वहीं से तेल खरीदेगा जहां से उसे सबसे बेहतर आर्थिक शर्तें मिलें—चाहे वह मध्य पूर्व हो, रूस हो, अमेरिका हो या कोई अन्य देश।

इस तरह यह दावा कि अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की “इजाजत” दी है, तथ्यों की जांच में टिक नहीं पाता। 30 दिन का अमेरिकी लाइसेंस पश्चिमी कंपनियों के लिए था, न कि भारत जैसे संप्रभु देशों के लिए।

आज के दौर में सोशल मीडिया पर भू-राजनीतिक मुद्दों से जुड़ी कई अधूरी या भ्रामक बातें तेजी से फैल जाती हैं। लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार, प्रतिबंध और व्यापार व्यवस्था की वास्तविकता कहीं अधिक जटिल और संतुलित है।


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