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कागजों पर मुनाफे में आईं बिजली वितरण कंपनियां, नकदी संकट अब भी बरकरार : सीईए रिपोर्ट

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ST.News Desk

नई दिल्ली: देश की बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) पहली बार कागजी तौर पर मुनाफे में आई हैं, लेकिन सेक्टर का नकदी संकट अब भी पूरी तरह दूर नहीं हुआ है। बकाया भुगतान और राजस्व की देरी से वसूली के कारण वितरण प्रणाली पर दबाव बना हुआ है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) द्वारा तैयार 14वीं एकीकृत रेटिंग एवं रैंकिंग रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में डिस्कॉम्स ने एक्रुअल आधार पर 2,701 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ (PAT) दर्ज किया, जबकि FY24 में 27,022 करोड़ रुपये का घाटा था।

यह रिपोर्ट शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश के परवाणू में बिजली मंत्रालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘चिंतन शिविर’ के दौरान केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा जारी की गई।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह सुधार मुख्य रूप से एक्रुअल-आधारित लेखांकन का परिणाम है, न कि नकद अधिशेष का। भुगतान में देरी और ऊंचे रिसीवेबल्स (वसूलियां) अब भी बिजली वितरण क्षेत्र की नकदी स्थिति पर दबाव बनाए हुए हैं।

उत्पादक कंपनियों को भुगतान में देरी

टर्नअराउंड के बावजूद, FY25 में उत्पादन और ट्रांसमिशन कंपनियों को भुगतान के औसत दिन 113 रहे, जो FY24 के 132 दिनों से मामूली सुधार है।
हालांकि 20 डिस्कॉम्स ने 60 दिनों के भीतर भुगतान सीमित रखा, लेकिन 23 यूटिलिटीज में भुगतान अवधि 90 दिनों से अधिक रही, जिसके चलते इस प्रमुख मानक पर उन्हें शून्य अंक मिले। यह दर्शाता है कि लेट पेमेंट सरचार्ज (LPS) नियमों जैसे हस्तक्षेपों के बावजूद बिजली खरीद बिलों के भुगतान में देरी जारी है।

रिसीवेबल्स ऊंचे, नकदी फंसी

राजस्व पक्ष में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। FY25 में औसत रिसीवेबल्स 112 दिन रहे, जो FY24 के 113 दिनों के लगभग बराबर है। केवल 26 यूटिलिटीज 60 दिनों के भीतर वसूली बनाए रख सकीं, जबकि 19 डिस्कॉम्स में रिसीवेबल्स 120 दिनों से अधिक रहे। इसका कारण उपभोक्ताओं—विशेषकर सरकारी विभागों—से भुगतान में देरी और कुछ राज्यों में सब्सिडी प्रतिपूर्ति का लंबित रहना है।

लागत वसूली में सुधार, लेकिन कैश कन्वर्जन कमजोर

रिपोर्ट के अनुसार, टैरिफ-सब्सिडी-प्राप्त आधार पर एसीएस–एआरआर (औसत लागत-औसत राजस्व) अंतर FY25 में घटकर प्रति यूनिट 0.06 रुपये रह गया, जो FY24 में 0.20 रुपये था। कैश-एडजस्टेड आधार पर यह अंतर FY24 के 0.32 रुपये से सुधरकर FY25 में 0.07 रुपये हो गया। इससे कागजी तौर पर लागत वसूली में सुधार दिखता है, लेकिन ऊंचे रिसीवेबल्स और पेयेबल्स के कारण नकद प्रवाह में समानांतर सुधार नहीं हो सका।

परिचालन मानकों में सुधार, लेकिन असमान

एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल (AT&C) नुकसान FY25 में घटकर 15.04 प्रतिशत रह गया, जो FY24 में 15.97 प्रतिशत था। बिलिंग दक्षता 86.99 प्रतिशत से बढ़कर 87.59 प्रतिशत हुई, जबकि कलेक्शन दक्षता 96.6 प्रतिशत से बढ़कर 97.0 प्रतिशत पर पहुंची।
फिर भी, 27 यूटिलिटीज में AT&C नुकसान 15 प्रतिशत से अधिक रहा और 10 यूटिलिटीज न्यूनतम बिलिंग दक्षता मानक से नीचे रहीं, जिससे राज्यों के बीच सुधार की असमान तस्वीर सामने आती है।

ग्रेडिंग में सुधार, लेकिन चेतावनियां कायम

रेटिंग किए गए 65 यूटिलिटीज में से 31 को A+ या A ग्रेड मिला, जबकि C या C- श्रेणी वाली यूटिलिटीज की संख्या घटकर 11 रह गई (पिछले वर्ष 18 थी)। हालांकि, कई बड़ी राज्य-स्वामित्व वाली डिस्कॉम्स को ऑडिटर की प्रतिकूल राय, बढ़ती नियामक परिसंपत्तियां और ऋणदाताओं व बिजली आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान में चूक जैसे कारणों से ‘रेड कार्ड’ चेतावनियां मिलीं, जिससे उनके अंतिम ग्रेड सीमित रहे।

सब्सिडी अनुशासन बेहतर, पर तरलता चुनौती बनी

FY25 में सब्सिडी प्राप्ति 98.9 प्रतिशत रही, जो FY24 में 97.45 प्रतिशत थी। कई राज्यों ने पिछले तीन वर्षों की लगभग पूरी सब्सिडी बकाया राशि का निपटान किया। इसके बावजूद रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि केवल बेहतर सब्सिडी बुकिंग से तरलता संकट का समाधान संभव नहीं है, जब तक कि नकद भुगतान में तेजी और पूरी आपूर्ति श्रृंखला में सख्त भुगतान अनुशासन लागू न हो।


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