13 साल की उम्र में पोस्टर पेंट करने से लेकर पर्दे के पीछे की अनसुनी कहानियां
नाना पाटेकर को हम जिस नाम से जानते हैं, वह उनका असली नाम नहीं है। उनका असली नाम विश्वनाथ पाटेकर है। लेकिन एक परिचित ने उन्हें बचपन में ‘नाना’ कहकर बुलाना शुरू किया और धीरे-धीरे यही नाम उनकी पहचान बन गया। यहां तक कि बाद में उनके पासपोर्ट पर भी Nana नाम दर्ज हो गया।
लेकिन ‘नाना’ नाम की यह छोटी-सी कहानी उस शख्स की जिंदगी की बड़ी कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। जिस अभिनेता को आज करोड़ों लोग उनकी दमदार आवाज और संवाद अदायगी के लिए जानते हैं, उसने जिंदगी में भूख, आर्थिक तंगी और पारिवारिक मुश्किलों को बेहद करीब से देखा था।
13 साल की उम्र में हाथ में आया था ब्रश
नाना की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब वह सिर्फ 13 साल के थे। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अचानक खराब हो गई। उनके पिता का कारोबार और संपत्ति चली गई। परिवार की मदद करने के लिए नाना को पढ़ाई के साथ काम करना पड़ा।
स्कूल के बाद वह करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर चूनाभट्टी जाते थे, जहां फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम करते थे। इसके बदले उन्हें करीब 35 रुपये महीने और एक वक्त का खाना मिलता था। उस समय वह नौवीं कक्षा में पढ़ते थे। आज जिस अभिनेता के संवाद पर सिनेमाघरों में तालियां बजती थीं, उसी अभिनेता के हाथ कभी फिल्मों के पोस्टर रंगने में व्यस्त रहते थे। शायद यही वजह थी कि बाद में जब वह कैमरे के सामने आए तो उनके अभिनय में बनावटीपन कम और जिंदगी की सच्चाई ज्यादा दिखाई दी।
कहते थे- मुझे किसी एक्टिंग स्कूल की जरूरत नहीं पड़ी
नाना ने एक इंटरव्यू में अपने बचपन के संघर्ष को याद करते हुए कहा था कि भूख और उस समय मिली जिल्लत ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। उनका मानना था कि जिंदगी ने ही उन्हें अभिनय की सबसे बड़ी ट्रेनिंग दी। भूख, संघर्ष और लोगों को करीब से देखने का अनुभव ही उनके लिए एक्टिंग स्कूल बन गया। शायद इसी कारण उनके अभिनय में वह सहजता आई जो किसी किताब से नहीं सीखी जा सकती।
पिता से बहुत प्यार था, लेकिन डर भी लगता था
नाना ने अपने पिता गजानन पाटेकर के बारे में भी खुलकर बात की थी। उन्होंने बताया था कि वह अपने पिता से बहुत प्यार करते थे, लेकिन उनसे डरते भी थे। बचपन में वह अपने पिता का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए स्कूल और गांव के नाटकों में हिस्सा लेने लगे। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि जब उनके पिता उनका नाटक देखने आते हैं तो उन्हें खास ध्यान मिलता है। यानी जिस चीज ने आगे चलकर उन्हें महान अभिनेता बनाया, उसकी जड़ें शायद उनके बचपन के उन्हीं छोटे-छोटे मंचों में थीं।
पिता की मौत और जेब में पैसे नहीं थे
नाना की जिंदगी का सबसे दर्दनाक अध्याय उनके पिता की मौत से जुड़ा है। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता का निधन अस्पताल में हुआ था और उनके पास इलाज और दवाइयों के लिए पर्याप्त पैसे तक नहीं थे। उसी दौर में नाना थिएटर कर रहे थे। उन्होंने बेहद मार्मिक ढंग से बताया था कि पिता की मौत के बाद भी उन्हें नाटक करने पड़े क्योंकि परिवार को चलाना था और पैसे की जरूरत थी। यह शायद उस अभिनेता की जिंदगी का वह हिस्सा है जिसे पर्दे पर कभी नहीं दिखाया गया।
स्मिता पाटिल ने फिल्मों का रास्ता खोला
नाना के फिल्मी करियर में अभिनेत्री स्मिता पाटिल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। नाना ने बताया था कि स्मिता पाटिल उन्हें पुणे के दिनों से जानती थीं। उन्होंने उन्हें फिल्म की दुनिया में आने के लिए प्रेरित किया और निर्देशक रवि चोपड़ा से मिलवाया। शुरुआत में नाना को जो भूमिका मिली, वह उन्हें पसंद नहीं आई। लेकिन आगे चलकर उन्हें बेहतर भूमिका मिली और यहीं से उनकी बॉलीवुड यात्रा ने गति पकड़ी।
पर्दे के पीछे भी ‘नाना’ ही थे
नाना पाटेकर की एक खासियत यह रही कि वह सिर्फ कैमरे के सामने ही प्रभावशाली नहीं थे। हाल ही में अभिनेता अशोक सराफ ने एक पुराने थिएटर दौरे की घटना सुनाई। उनके मुताबिक एक नाटक के दौरान भीड़ बेकाबू हो गई थी और कलाकारों के लिए स्थिति खतरनाक हो गई। अशोक सराफ के अनुसार, नाना ने उन्हें भीड़ से निकालकर सुरक्षित जगह पहुंचाया और खुद रिक्शा चलाकर उन्हें रेस्ट हाउस तक ले गए। इसके बाद वह वापस गए और बाकी कलाकारों को भी सुरक्षित निकालने में मदद की। यह घटना बताती है कि मंच के पीछे भी नाना का व्यक्तित्व उतना ही तेज और जिम्मेदार था जितना पर्दे पर दिखाई देता था।
एक बच्चे को बिना ऑडिशन के फिल्म में मौका
नाना के बारे में एक और दिलचस्प किस्सा 2026 में अभिनेता पुष्कर जोग ने साझा किया। पुष्कर ने बताया कि जब वह सिर्फ 7 साल के थे और फिल्म ‘हम दोनों’ में काम कर रहे थे, तब नाना पाटेकर ने उन्हें बिना ऑडिशन के भूमिका के लिए चुना था। पुष्कर के मुताबिक, फिल्म के सेट पर जब वह एक घटना के बाद रोने लगे तो नाना ने उनका बचाव किया और बच्चे के साथ सख्ती से पेश आने पर आपत्ति जताई। यानी जिस अभिनेता की छवि पर्दे पर अक्सर सख्त और गुस्सैल किरदारों की रही, उसके भीतर एक बच्चे के लिए खड़े होने वाला बेहद संवेदनशील इंसान भी था।
नाना को स्टारडम से ज्यादा सुकून पसंद था
नाना ने कई बार कहा कि उन्हें स्टारडम के पीछे भागने में खास दिलचस्पी नहीं रही। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि अगर कल उन्हें अभिनय छोड़ना पड़े तो वह थिएटर करना शुरू कर देंगे। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज थी कि वह रात में चैन से सो सकें। यही शायद उनकी सबसे अलग पहचान थी। वह फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा जरूर रहे, लेकिन खुद को उस चमक-दमक का कैदी नहीं बनने दिया।
‘वेलकम’ वाला नाना और ‘क्रांतिवीर’ वाला नाना एक ही इंसान था
यही वजह है कि नाना पाटेकर को सिर्फ एक तरह के अभिनेता के रूप में याद करना मुश्किल है। एक तरफ ‘क्रांतिवीर’ का गुस्से से भरा प्रताप नारायण तिलक था। दूसरी तरफ ‘परिंदा’ का खतरनाक अन्ना। फिर ‘अब तक छप्पन’ का साधु आगाशे। और अचानक वही अभिनेता ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर लोगों को हंसा देता है। फिर ‘नटसम्राट’ में वही चेहरा दर्शकों की आंखों में आंसू ला देता है। यही नाना की असली ताकत थी—वह किरदार बदलते थे, लेकिन अभिनय की सच्चाई नहीं।

असली नाना शायद उनके किरदारों के बीच कहीं छिपे थे
उनकी जिंदगी को पीछे मुड़कर देखें तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। एक बच्चा जिसने पिता का ध्यान पाने के लिए नाटक किया। एक 13 साल का लड़का जिसने परिवार के लिए फिल्म पोस्टर पेंट किए। एक युवा जिसने थिएटर किया। एक बेटा जिसने आर्थिक मजबूरी में पिता के निधन के बाद भी मंच पर जाना जारी रखा। और फिर वही इंसान करोड़ों लोगों का पसंदीदा अभिनेता बना।
इसलिए नाना पाटेकर की कहानी सिर्फ एक फिल्म स्टार की कहानी नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जिसने जिंदगी की मुश्किलों को अभिनय की भाषा में बदल दिया।
उनका असली नाम विश्वनाथ था। दुनिया ने उन्हें नाना कहा। और भारतीय सिनेमा ने उन्हें एक ऐसा अभिनेता बनाया जिसे सिर्फ फिल्मों की सूची से नहीं, बल्कि उसके निभाए किरदारों और उनकी सच्चाई से याद किया जाएगा।
कभी पोस्टर पर दूसरों के चेहरे रंगने वाला वह लड़का बाद में खुद भारतीय सिनेमा का एक ऐसा चेहरा बन गया, जिसे लोग कभी नहीं भूल पाए।
























