- उत्तर-पश्चिम, पश्चिम-मध्य और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में अगले 6-7 दिनों तक बारिश की गतिविधियां कमजोर रहने का अनुमान है.
- बंगाल की खाड़ी के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में नया साइक्लोनिक सर्कुलेशन बनने की संभावना मॉनसून में सुधार की उम्मीद जगा रही है.
- 18 से 22 जुलाई के बीच मॉनसून ट्रफ सामान्य स्थिति के करीब लौट सकती है, लेकिन लंबे समय का पूर्वानुमान अभी बदल सकता है.
ST.News Desk
New Delhi : देश के मौसम (बारिश) में इस समय दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाई दे रही हैं. पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में भारी बारिश का दौर बना हुआ है, जबकि उत्तर-पश्चिम, पश्चिम-मध्य और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के बड़े हिस्से कमजोर मॉनसून गतिविधियों का सामना कर रहे हैं. बारिश के इस असमान वितरण ने किसानों के साथ-साथ जल प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों की चिंता भी बढ़ा दी है.

भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD ने 13 जुलाई को जारी अपने ताजा पूर्वानुमान में कहा है कि उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों, पश्चिम-मध्य भारत और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में अगले छह से सात दिनों तक बारिश की गतिविधियां सामान्य से कमजोर रह सकती हैं. इसका अर्थ है कि इन क्षेत्रों में मॉनसून की व्यापक वापसी के लिए अभी कुछ दिन और इंतजार करना पड़ सकता है.
हालांकि मध्यम अवधि के पूर्वानुमानों में कुछ ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं, जिनसे 18 जुलाई के बाद बारिश की स्थिति में बदलाव की उम्मीद बन रही है. IMD के विस्तारित पूर्वानुमान के मुताबिक उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी और उससे सटे ओडिशा-पश्चिम बंगाल तट के पास नया साइक्लोनिक सर्कुलेशन बनने की संभावना है. इसके साथ ही 16 से 22 जुलाई वाले सप्ताह में मॉनसून ट्रफ का पश्चिमी हिस्सा कई दिनों तक सामान्य स्थिति के आसपास रह सकता है.
देशभर में बारिश का वितरण असमान
दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने 9 जुलाई को पूरे देश को कवर कर लिया था. इसके बावजूद उस समय देश में कुल मौसमी बारिश सामान्य से करीब 14 फीसदी कम दर्ज की गई थी. मॉनसून का पूरे देश में पहुंच जाना यह सुनिश्चित नहीं करता कि हर क्षेत्र में एक जैसी बारिश होगी. बारिश की मात्रा मॉनसून ट्रफ, लो प्रेशर एरिया, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी तथा ऊपरी वायुमंडलीय हवाओं की स्थिति पर निर्भर करती है.

फिलहाल पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में मॉनसून अधिक सक्रिय दिखाई दे रहा है. बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई है. इसके विपरीत राजस्थान सहित उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ मैदानी क्षेत्रों में मॉनसून गतिविधियां कमजोर रहने की आशंका है.
यह असमानता खेती के लिए चुनौती बन सकती है. जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक पर्याप्त बारिश नहीं होती, वहां खरीफ फसलों की बुवाई, पौधों की शुरुआती बढ़त और सिंचाई की मांग प्रभावित हो सकती है. धान, मक्का, दालें, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों के लिए जुलाई की बारिश काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है.
मॉनसून की रफ्तार क्यों हुई कमजोर?
मॉनसून की बारिश केवल समुद्र से आने वाली नमी पर निर्भर नहीं करती. मॉनसून ट्रफ की स्थिति इसमें बड़ी भूमिका निभाती है. यह कम दबाव वाला एक लंबा क्षेत्र होता है, जो आमतौर पर उत्तर-पश्चिम भारत से गंगा के मैदानी इलाकों होते हुए बंगाल की खाड़ी तक फैला रहता है.

जब मॉनसून ट्रफ अपनी सामान्य स्थिति से हिमालय की तलहटी की ओर खिसक जाती है, तो मैदानी और मध्य भारत में बारिश कमजोर हो सकती है. ऐसी स्थिति में हिमालय के आसपास और पूर्वोत्तर भारत में बारिश बढ़ने की संभावना रहती है. ट्रफ के दक्षिण की ओर आने पर मध्य और पश्चिमी भारत में बारिश की गतिविधियां मजबूत हो सकती हैं.
IMD के विस्तारित पूर्वानुमान में संकेत दिया गया है कि 16 से 22 जुलाई के दौरान मॉनसून ट्रफ का पश्चिमी हिस्सा कई दिनों तक सामान्य स्थिति के आसपास रह सकता है. इसका वास्तविक प्रभाव बंगाल की खाड़ी में बनने वाले सिस्टम की ताकत, दिशा और अवधि पर निर्भर करेगा.
बंगाल की खाड़ी से बढ़ी उम्मीद
भारत में जुलाई और अगस्त के दौरान होने वाली व्यापक बारिश में बंगाल की खाड़ी पर बनने वाले लो प्रेशर एरिया और साइक्लोनिक सर्कुलेशन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. ये सिस्टम समुद्र से नमी लेकर पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ते हैं और ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात तथा उत्तर प्रदेश तक बारिश करा सकते हैं.
IMD ने उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी और ओडिशा-पश्चिम बंगाल तट के पास एक नए साइक्लोनिक सर्कुलेशन के विकसित होने की संभावना जताई है. सिस्टम मजबूत होकर लो प्रेशर एरिया में बदलता है या नहीं, इस पर आने वाले दिनों में स्थिति और स्पष्ट होगी.
अंतरराष्ट्रीय मौसम मॉडल सात से दस दिन आगे के समय में बंगाल की खाड़ी और पश्चिमी प्रशांत महासागर की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं. हालांकि इतने लंबे समय के मॉडल पूर्वानुमानों में बदलाव की संभावना अधिक होती है. इसलिए 18 से 25 जुलाई के दौरान मॉनसून के पूरी तरह सक्रिय होने को अभी पक्की भविष्यवाणी के बजाय एक संभावित मौसम विंडो के रूप में देखना बेहतर होगा.
18 से 25 जुलाई का समय क्यों महत्वपूर्ण?
18 से 25 जुलाई के बीच बंगाल की खाड़ी में कोई मजबूत सिस्टम बनता है और वह पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ता है तो मध्य भारत में बारिश बढ़ सकती है. इसके प्रभाव से मॉनसून ट्रफ सामान्य स्थिति में लौट सकती है और उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात तथा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में वर्षा गतिविधियां मजबूत हो सकती हैं.
लेकिन सिस्टम कमजोर रहा, समुद्र में ही समाप्त हो गया या उसकी दिशा भारत से दूर रही तो बारिश में अपेक्षित सुधार नहीं होगा. मौसम प्रणाली का सटीक रास्ता उसके बनने के बाद ही अधिक भरोसे के साथ बताया जा सकता है.
फिलहाल आधिकारिक विस्तारित पूर्वानुमान 16 से 22 जुलाई के सप्ताह में देशभर की कुल बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना भी दिखाता है. इसलिए बंगाल की खाड़ी में सिस्टम बनने के संकेत सकारात्मक जरूर हैं, लेकिन इससे सभी सूखे क्षेत्रों में तुरंत व्यापक बारिश होने की गारंटी नहीं है.
उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभ का असर
उत्तर-पश्चिम भारत के मौसम पर पश्चिमी विक्षोभ का भी असर दिखाई दे सकता है. पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर और पश्चिम एशिया की ओर से आने वाली ऊपरी वायुमंडलीय प्रणाली होती है. यह हिमालयी क्षेत्र में बादल, बारिश और सर्दियों में बर्फबारी का कारण बनती है.
मॉनसून के दौरान पश्चिमी विक्षोभ और नम पूर्वी हवाओं के बीच संपर्क होने पर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में गरज-चमक तथा तेज हवाओं के साथ बारिश हो सकती है. हालांकि IMD के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी हिस्सों में अगले छह से सात दिनों के दौरान कुल बारिश गतिविधियां कमजोर रहने की संभावना है. इसलिए स्थानीय बारिश होने के बावजूद पूरे क्षेत्र में लगातार सक्रिय मॉनसून की स्थिति बनने में समय लग सकता है.
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अगला सप्ताह?
बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में किसान मिट्टी की नमी और स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर बुवाई तथा सिंचाई का फैसला करें. कमजोर बारिश के दौरान आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने पर भूजल और जलाशयों पर दबाव बढ़ सकता है. वहीं केवल लंबी अवधि के मॉडल को देखकर बुवाई में बड़ा बदलाव करना भी जोखिम भरा हो सकता है.
अगले कुछ दिनों में बंगाल की खाड़ी के संभावित सिस्टम की स्थिति स्पष्ट होने लगेगी. उसके बाद यह पता चल सकेगा कि मध्य और उत्तर भारत में बारिश का नया दौर कितना मजबूत और कितने समय तक चल सकता है.
जलवायु परिवर्तन से बढ़ी मौसम की अनिश्चितता
हाल के वर्षों में मॉनसून के दौरान लंबे सूखे अंतराल और कम समय में अत्यधिक बारिश जैसी घटनाओं पर चिंता बढ़ी है. बढ़ता तापमान वायुमंडल की नमी धारण करने की क्षमता और हवा के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है. हालांकि किसी एक कमजोर मॉनसून अवधि को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं कहा जा सकता, लेकिन लंबे समय के रुझानों में बारिश के वितरण का असमान होना एक महत्वपूर्ण चुनौती है.
वर्तमान स्थिति में तत्काल तस्वीर यह है कि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में भारी बारिश जारी रह सकती है, जबकि उत्तर-पश्चिम, पश्चिम-मध्य और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में बारिश अगले छह से सात दिनों तक कमजोर रह सकती है. इसके बाद बंगाल की खाड़ी में संभावित साइक्लोनिक सर्कुलेशन मॉनसून की दिशा बदलने वाला प्रमुख सिस्टम बन सकता है.
इसलिए 18 से 25 जुलाई की अवधि पर सभी की नजर रहेगी. लेकिन किसानों और आम लोगों को किसी एक लंबे समय के मॉडल के बजाय IMD के दैनिक और पांच से सात दिन वाले आधिकारिक पूर्वानुमानों को प्राथमिकता देनी चाहिए.

