crossorigin="anonymous"> LAC और चीनी टैंकों के मुद्दे पर संसद में हंगामा, राहुल गांधी को रोकने पर बोले शशि थरूर, ‘उन्हें बोलने देना चाहिए था’ - Sanchar Times

LAC और चीनी टैंकों के मुद्दे पर संसद में हंगामा, राहुल गांधी को रोकने पर बोले शशि थरूर, ‘उन्हें बोलने देना चाहिए था’

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ST.News Desk

नई दिल्ली : संसद में आज उस वक्त तीखी बहस देखने को मिली जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे का जिक्र करते हुए एलएसी पर चीनी टैंकों की मौजूदगी का मुद्दा उठाया और मोदी सरकार पर सीधे तौर पर निशाना साधा। राहुल गांधी के बयान के बाद सदन में हंगामा बढ़ गया, जिसके चलते कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी गई।

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर की प्रतिक्रिया सामने आई है। थरूर ने कहा कि सरकार की तरफ से जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दी गई और राहुल गांधी को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए था।

‘राहुल गांधी जिस मुद्दे को उठा रहे थे, वह पब्लिक डोमेन में है’


शशि थरूर ने कहा, “मेरे हिसाब से सरकार का रिएक्शन जरूरत से ज्यादा था। राहुल जी जिस मुद्दे को उठाना चाह रहे थे, वह पहले से ही पब्लिक डोमेन में है। वह कारवां मैगजीन में छपे एक आर्टिकल का हवाला दे रहे थे, जिसमें जनरल नरवणे के एक संस्मरण का जिक्र है, जो अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है। सरकार को इस बात पर आपत्ति जताने के बजाय उन्हें बोलने देना चाहिए था।”

‘कोई भी वही आर्टिकल पढ़ सकता है’


थरूर ने आगे कहा कि जिस आर्टिकल का जिक्र किया गया, वह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। “कोई भी वही आर्टिकल पढ़ सकता है जो राहुल गांधी ने पढ़ा है। सरकार के ज्यादा रिएक्शन की वजह से आज दोपहर बेवजह संसद की कार्यवाही ठप हो गई। संसद का काम ही चर्चा करना है। अगर तथ्य गलत हैं, तो सबसे बेहतर जवाब तथ्यों को सही करना है, न कि चर्चा को रोकना,” उन्होंने कहा।

‘यह सेना पर नहीं, सरकार के फैसलों पर सवाल है’

कांग्रेस सांसद ने साफ किया कि उस आर्टिकल में सेना या सैनिकों पर कोई आरोप नहीं लगाया गया है। “यह मुद्दा केंद्र सरकार द्वारा लिए गए या न लिए गए फैसलों से जुड़ा है और राहुल गांधी वही सवाल उठाना चाहते थे। उन्हें अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिला,” थरूर ने कहा।

नेहरू काल की बहसों का दिया उदाहरण

शशि थरूर ने संसद की पुरानी परंपराओं का जिक्र करते हुए कहा कि नेहरू के समय संसद में खुलकर बहस होती थी। “1962 के चीन युद्ध के दौरान भी संसद में रोज बहस होती थी। कोई व्हिप नहीं था, यहां तक कि सरकारी सांसद भी प्रधानमंत्री की आलोचना कर सकते थे। 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान भी संसद सत्र चलते रहे और देश को भरोसे में लिया गया,” उन्होंने कहा।

‘चर्चा से डरने वाली सरकार क्यों?’

राहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने सवाल उठाया, “हमारे पास ऐसी सरकार क्यों है जो चर्चा से डरती है? यह दुखद है। सरकार को बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए था, गलतफहमियां दूर करनी चाहिए थीं। चीन का मुद्दा पूरे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है और इस पर खुली चर्चा होनी चाहिए।”

‘यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं’

थरूर ने कहा कि विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और अन्य जिम्मेदार लोगों को संसद में बोलने देना चाहिए ताकि देश को सच्चाई पता चले। “सब कुछ छिपा देना न तो लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही संसद के कामकाज के लिए,” उन्होंने कहा।


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