ST.News Desk
नई दिल्ली: देश में इस साल मॉनसून पर सुपर अल नीनो का साया गहराता दिख रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो परिस्थितियां जुलाई से सितंबर के बीच चरम पर पहुंच सकती हैं, जिससे भारत में मॉनसूनी बारिश प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। सरकार ने ऐसे 197 जिलों की पहचान की है, जहां इसका सबसे अधिक असर पड़ सकता है।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि संभावित सूखे और कम वर्षा की स्थिति से निपटने के लिए राज्यों के साथ मिलकर आपातकालीन कार्ययोजना तैयार की गई है। वहीं भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान अल नीनो के और मजबूत होने की आशंका जताई है।
जुलाई-सितंबर में दिखेगा सबसे ज्यादा असर
मौसम विभाग के अनुसार जुलाई से सितंबर का समय भारत में सबसे अधिक वर्षा का होता है, लेकिन अल नीनो के प्रभाव से इस अवधि में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। IMD ने इस साल के मौसमी वर्षा अनुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत (LPA) के करीब 90 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जून में कुछ क्षेत्रों में हुई अच्छी प्री-मॉनसून बारिश वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाती। असली चुनौती अगस्त और सितंबर में सामने आ सकती है, जब वातावरण में नमी की कमी के कारण वर्षा में गिरावट देखने को मिल सकती है।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक वैश्विक जलवायु पैटर्न है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है। इससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और दुनिया के कई हिस्सों में मौसम असामान्य हो जाता है।
अल नीनो के दौरान समुद्र के ऊपर बहने वाली व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे गर्म पानी पूर्वी प्रशांत महासागर की ओर फैल जाता है। इसका असर भारत के मॉनसून पर भी पड़ता है और अक्सर वर्षा में कमी दर्ज की जाती है।
खेती और खाद्य महंगाई पर बढ़ेगा दबाव
भारत की अधिकांश खरीफ खेती मॉनसून पर निर्भर करती है। ऐसे में कम बारिश का सीधा असर धान, दालें, तिलहन, सोयाबीन, मूंगफली, मक्का और बाजरा जैसी फसलों पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो वाले वर्षों में चावल का उत्पादन औसतन लाखों टन तक घट सकता है। यदि फसल उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्यान्न की आपूर्ति कम होगी और खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होगा। वित्तीय संस्थानों का अनुमान है कि खाद्य मुद्रास्फीति में अतिरिक्त बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
जलाशयों और बिजली उत्पादन पर भी असर
कम वर्षा का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। जलाशयों में पानी का स्तर घटने से पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और पंपों के बढ़ते इस्तेमाल से बिजली की मांग बढ़ने की संभावना है, जिससे ऊर्जा क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है।
पिछला रिकॉर्ड क्या कहता है?
1950 के बाद भारत में दर्ज 16 अल नीनो घटनाओं में से 9 बार मॉनसून पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। 1982-83, 1997-98 और 2015-16 को सुपर अल नीनो के प्रमुख वर्षों के रूप में याद किया जाता है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि 2026 में भी ऐसी परिस्थितियां बनने पर बारिश में कमी, सूखे का खतरा और महंगाई जैसी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो का असर पूरे देश में एक जैसा नहीं होता। पूर्वोत्तर भारत में सामान्य वर्षा की संभावना बनी हुई है, जबकि उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्रों में अधिक जोखिम देखा जा रहा है।
देश की अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम भूमिका को देखते हुए इस साल का मॉनसून न केवल किसानों बल्कि महंगाई, बिजली उत्पादन और आर्थिक विकास की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

