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CPEC 2.0 की शुरुआत से भारत के सामने नई भू-राजनीतिक चुनौतियां

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ST.News, International Desk : वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में चीन और अमेरिका के बीच तनाव के दो प्रमुख केंद्रबिंदु उभरे हैं: अमेरिकी टैरिफ नीति और चीन का रणनीतिक विस्तार। जहां ट्रंप प्रशासन व्यापार युद्ध में उलझा है, वहीं चीन ने भारत, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियों के जरिए अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत की है। इस संदर्भ में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के दूसरे चरण (CPEC 2.0) की शुरुआत ने भारत के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

CPEC 2.0: भारत के लिए सुरक्षा चिंता

परियोजना का विस्तार : चीन और पाकिस्तान ने 8.5 अरब डॉलर के 21 नए समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें CPEC के दूसरे चरण के तहत पांच नए आर्थिक गलियारे शामिल हैं। यह परियोजना चीन के शिनजियांग को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ती है, जो भारत की संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है क्योंकि यह विवादित गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र से गुजरती है।

भारत का विरोध

भारत ने CPEC को “संप्रभुता उल्लंघन” बताते हुए लगातार इसका विरोध किया है। यह परियोजना न केवल पाकिस्तान को रणनीतिक लाभ देती है बल्कि चीन को भारतीय उपमहाद्वीप में सैन्य घुसपैठ का अवसर भी प्रदान करती है।

अमेरिका-भारत-चीन त्रिकोण

ट्रंप का टैरिफ युद्ध : अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने का निर्णय लिया। 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार 136 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें भारत का व्यापार घाटा 73 अरब डॉलर रहा।

चीन की दोहरी रणनीति: एक ओर चीन भारत के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर CPEC जैसी परियोजनाओं के माध्यम से पाकिस्तान को सैन्य-आर्थिक समर्थन देकर भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है।

भारत के लिए चुनौतियां

रणनीतिक संतुलन : भारत को अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी सुरक्षा एवं आर्थिक हितों को प्राथमिकता देनी होगी। CPEC का प्रतिकार: CPEC के प्रभाव को कम करने के लिए भारत को चाबहार बंदरगाह (ईरान) और इंडो-पैसिफिक पार्टनरशिप जैसी पहलों को तेजी से आगे बढ़ाना होगा।

चीन की “मित्रता के पीछे छुपे खंजर” की रणनीति (जैसा कि 1962 के युद्ध और गलवान घाटी विवाद में देखा गया) को ध्यान में रखते हुए, भारत को CPEC 2.0 जैसी परियोजनाओं को लेकर सतर्क रहना होगा। साथ ही, अमेरिका के साथ संबंधों को पुनर्जीवित करने और दक्षिण-पूर्व एशिया में सहयोगी देशों (जैसे वियतनाम, जापान) के साथ गठजोड़ बढ़ाने की आवश्यकता है।

    सवाल यह उठता है कि क्या भारत चीन की “डेट एंड डिप्लोमेसी” (कर्ज और कूटनीति) की रणनीति का मुकाबला करने के लिए तैयार है? इसका उत्तर भारत की बहुआयामी विदेश नीति और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था (“आत्मनिर्भर भारत”) में निहित है।


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