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रिसाइकल सामग्री पर जीएसटी में राहत की मांग, बजट 2026 से पहले सीएसई ने उठाई आवाज

Posted on January 28, 2026January 28, 2026 By Chhavi Singh

कच्चे माल और रिसाइकल सामग्री पर समान कर को बताया हरित अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह; जीएसटी 5% या शून्य करने से ₹90,000 करोड़ से अधिक का शुद्ध लाभ संभव

ST.News Desk

नई दिल्ली : केंद्रीय बजट 2026 की घोषणा से पहले सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने सरकार से वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था में सुधार की जोरदार मांग की है। सीएसई ने पुनर्चक्रण योग्य कचरे पर जीएसटी में राहत देने की अपील करते हुए कहा है कि मौजूदा कर ढांचा हरित और परिपत्र (सर्कुलर) अर्थव्यवस्था की दिशा में देश की प्रगति में बाधा बन रहा है।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लिखे पत्र में सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा, “भारत ऊर्जा, उद्योग, कचरा, परिवहन और कृषि जैसे क्षेत्रों में सरकारी नीतियों के माध्यम से हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इस बदलाव को तेज करने में जीएसटी और वित्तीय ढांचे की बड़ी भूमिका हो सकती है।”

सीएसई की हालिया रिपोर्ट रिलैक्स द टैक्स में मौजूदा कर प्रणाली की एक गंभीर खामी की ओर इशारा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में पुनर्चक्रित (रिसाइकल) सामग्री पर वही कर लगाया जा रहा है जो नए कच्चे माल पर लागू है, जिससे उन क्षेत्रों को नुकसान हो रहा है जो परिपत्र अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा सकते हैं।

सीएसई में औद्योगिक प्रदूषण कार्यक्रम के निदेशक निवित के यादव ने बताया कि अध्ययन में धातु स्क्रैप, प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा, बैटरी कचरा, कागज, कांच, टायर और एंड-ऑफ-लाइफ वाहनों सहित 12 प्रमुख कचरा और रिसाइक्लिंग क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया है। उन्होंने कहा, “हर क्षेत्र में पुन: उपयोग की अपार संभावनाएं हैं, जिससे सामग्री दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ कचरा और प्रदूषण को कम किया जा सकता है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा जीएसटी ढांचे के कारण दोहरा नुकसान हो रहा है—एक ओर बड़ी मात्रा में लेन-देन अनौपचारिक क्षेत्र में चला गया है और दूसरी ओर रिसाइक्लिंग, संसाधन सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हुई है। सीएसई का अनुमान है कि यदि पुनर्चक्रण योग्य कचरे पर जीएसटी को 5 प्रतिशत या शून्य किया जाए और अनौपचारिक आपूर्ति श्रृंखलाओं को औपचारिक व्यवस्था में जोड़ा जाए, तो आंशिक एकीकरण की स्थिति में सालाना लगभग ₹34,000 करोड़ और पूर्ण एकीकरण की स्थिति में ₹90,000 करोड़ से अधिक का शुद्ध राजस्व लाभ हो सकता है।

सीएसई के अनुसार, यह कदम एमएसएमई को मजबूत करेगा, लाखों अनौपचारिक श्रमिकों की आजीविका में सुधार लाएगा, कच्चे माल के आयात पर निर्भरता घटाएगा और देश की परिपत्र अर्थव्यवस्था व औद्योगिक प्राथमिकताओं के अनुरूप वित्तीय नीति को मजबूती देगा।

सीएसई में औद्योगिक प्रदूषण कार्यक्रम के प्रबंधक पार्थ कुमार ने कहा, “सीमेंट तथा लौह-इस्पात क्षेत्रों के डीकार्बनाइजेशन पर हमारी रिपोर्ट बताती है कि स्लैग, फ्लाई ऐश, नगरपालिका कचरा और स्टील स्क्रैप जैसे अपशिष्ट पदार्थों का पुन: उपयोग उत्सर्जन घटाने और कचरा कम करने का बड़ा अवसर है। लेकिन रिसाइकल और कम-कार्बन सामग्री पर 18 प्रतिशत जीएसटी एक बड़ा हतोत्साहक है।”

सुनीता नारायण ने कहा कि जीएसटी दरों में कमी हरित उत्पादन को प्रोत्साहन दे सकती है। उदाहरण के तौर पर, सीमेंट क्षेत्र में ओपीसी सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन वाला सीमेंट है, जबकि कचरे का उपयोग करने वाले अन्य सीमेंट प्रकारों का उत्सर्जन कम होता है। “जब जीएसटी उत्सर्जन तीव्रता के आधार पर अलग-अलग सीमेंट प्रकारों में अंतर नहीं करता, तो उद्योग और उपभोक्ताओं के लिए हरित विकल्प अपनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं बचता,” उन्होंने कहा।

सीएसई ने अपनी रिपोर्ट डिकार्बनाइजिंग इंडिया: द सीमेंट सेक्टर में सुझाव दिया है कि कम कार्बन उत्सर्जन वाले सीमेंट—जैसे पीपीसी, पीएससी, सीसी और एलसी3—पर कम जीएसटी लगाया जाए, जिससे ओपीसी के उत्पादन को सीमित किया जा सके और कम-कार्बन सीमेंट की मांग व उत्पादन को बढ़ावा मिले।

वित्त मंत्री को लिखे पत्र में सीएसई ने जोर देते हुए कहा कि कचरे पर करों का युक्तिकरण केवल एक वित्तीय सुधार नहीं है, बल्कि यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि कचरा भी एक संसाधन है। सुनीता नारायण ने कहा, “कर में राहत देकर हम हरित उद्यमों के लिए समान अवसर बना सकते हैं, संसाधनों का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं और रिसाइक्लिंग पर निर्भर लाखों कमजोर श्रमिकों की आजीविका की रक्षा कर सकते हैं।”

दिल्ली/NCR, राष्ट्रीय

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