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अनुसूची-I’ के संरक्षित हाथी की मौत: एक महीने तक भटकता रहा, सिस्टम देखता रहा!

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डेस्क/बिहार

लोकेशन/सासाराम

रिपोर्ट/हैदर अली रोहतास ब्यूरो चीफ/संचार टाइम्स

स्लग/‘अनुसूची-I’ के संरक्षित हाथी की मौत: एक महीने तक भटकता रहा, सिस्टम देखता रहा!

एंकर/रोहतास और औरंगाबाद के सोन क्षेत्र में जंगली हाथी की दर्दनाक मौत ने वन्यजीव संरक्षण की पूरी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। झारखंड के जंगल से भटककर आया यह हाथी करीब एक महीने तक दो जिले के इलाकों में घूमता रहा, लेकिन उसे सुरक्षित जंगल तक पहुंचाने के लिए प्रशासन कोई ठोस रणनीति नहीं बना सका। आखिरकार हाईटेंशन बिजली लाइन की चपेट में आकर उसकी मौत हो गई। हैरानी की बात यह है कि हाथी को भारत में सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त है और उसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में रखा गया है, जिसके तहत उसकी सुरक्षा सरकार की सीधी जिम्मेदारी मानी जाती है।

एक महीने की कहानी: चेतावनी मिलती रही, सोता रहा सिस्टम!
19 फरवरी को औरंगाबाद के अम्बा इलाके में पहली बार हाथी देखा गया। इसके बाद वह लगातार कई इलाकों में घूमता रहा, फसलें और खेती-बाड़ी के उपकरणों को नुकसान करता रहा। 27 फरवरी के आसपास हाथी रोहतास जिले के सोन क्षेत्र में पहुंच गया और लगभग दो सप्ताह तक सीमावर्ती इलाकों में भटकता रहा।
13 मार्च को वह इंद्रपुरी बराज में फंस गया, लेकिन वहां से निकलकर फिर औरंगाबाद की ओर चला गया। 14 मार्च को बारुण प्रखंड के मेह गांव में हाईटेंशन बिजली लाइन की चपेट में आकर उसकी मौत हो गई। यानी करीब 25 दिनों तक प्रशासन के पास चेतावनी थी, फिर भी हाथी को सुरक्षित जंगल तक नहीं पहुंचाया जा सका।
समाजसेवी तोराब नियाजी ने कहा कि हाथी करीब एक महीने तक मैदानी इलाकों और सोन क्षेत्र में भटकता रहा, लेकिन वन विभाग और जिला प्रशासन ने उसे सुरक्षित जंगल तक पहुंचाने के लिए कोई प्रभावी और वैज्ञानिक कदम नहीं उठाया। अगर समय रहते समन्वित कार्रवाई होती तो इस बेजुबान की जान बचाई जा सकती थी।
उन्होंने कहा कि हाथी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में रखा गया है, जिसमें आने वाले जीवों को सर्वोच्च सुरक्षा दी जाती है। ऐसे में उसकी मौत प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला है और इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।

सिस्टम पर 8 बड़े सवाल
सवाल 1: जब 25 दिन तक हाथी दिख रहा था तो रेस्क्यू ऑपरेशन क्यों नहीं चला?
क्या वन विभाग ने विशेषज्ञ रेस्क्यू टीम बुलाई गई, ट्रैंक्विलाइजर गन और प्रशिक्षित स्टाफ लगाया गया, हाथी को जंगल की ओर मोड़ने के लिए वैज्ञानिक रणनीति बनाई गई। अगर नहीं, तो क्या यह सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता नहीं है?

सवाल 2: क्या रोहतास और औरंगाबाद प्रशासन के बीच समन्वय था?
करीब एक महीने तक हाथी दोनों जिलों की सीमा में घूमता रहा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या संयुक्त ऑपरेशन चलाया गया?
क्या दोनों जिलों के डीएम और डीएफओ ने संयुक्त रणनीति बनाई? या फिर हाथी को सिर्फ एक जिले से दूसरे जिले की ओर हांकने तक ही कार्रवाई सीमित रही?

सवाल 3: क्या बिजली विभाग की लापरवाही से गई हाथी की जान?
हाथी की मौत हाईटेंशन बिजली लाइन से हुई। ऐसे में अब यह भी सवाल उठता है कि क्या उस इलाके में बिजली लाइन की ऊंचाई और सुरक्षा मानक सही थे? क्या वन्यजीव संवेदनशील क्षेत्रों में लाइन की विशेष सुरक्षा व्यवस्था है? अगर सुरक्षा में कमी साबित होती है तो मामला विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत गंभीर बन सकता है।

सवाल 4: अनुसूची-I के जीव की मौत पर कौन देगा जवाब?
भारत में हाथी को सर्वोच्च संरक्षण प्राप्त है। उसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में रखा गया है, जिसमें शेर, बाघ, हाथी जैसे दुर्लभ वन्यजीव शामिल हैं। इस कानून के तहत ऐसे जीव की मौत पर कड़ी जांच और जिम्मेदारी तय करना अनिवार्य होता है। तो सवाल यह भी है कि क्या इस मामले में भी वही सख्ती दिखाई जाएगी?

सवाल 5: क्या सोन क्षेत्र में वन्यजीव आपदा प्रबंधन बिल्कुल नहीं है?
सोन नदी के आसपास के इलाके में अक्सर जंगली जानवरों के भटकने की घटनाएं होती हैं। फिर भी क्या यहां स्थायी वन्यजीव रेस्क्यू यूनिट है? क्या कोई कंट्रोल रूम या रैपिड रिस्पॉन्स टीम है? अगर नहीं, तो क्या यह प्रशासन की तैयारी की बड़ी कमी नहीं है?

सवाल 6: क्या वन्यजीव कॉरिडोर की अनदेखी हो रही है?
विशेषज्ञों के अनुसार झारखंड और कैमूर के जंगलों के बीच वन्यजीवों के पारंपरिक रास्ते हैं। लेकिन क्या इन कॉरिडोर की पहचान और सुरक्षा की गई है? क्या विकास कार्यों ने इन रास्तों को बंद कर दिया है? अगर ऐसा है तो यह समस्या आगे और बढ़ सकती है।

सवाल 7: क्या पहले भी ऐसे मामले हुए और उनसे कोई सबक नहीं लिया गया?
देश के कई राज्यों में बिजली लाइन से हाथियों की मौत की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद क्या बिहार में जोखिम वाले क्षेत्रों का सर्वे हुआ? क्या बिजली लाइनों को सुरक्षित बनाने के निर्देश लागू किए गए?

सवाल 8: क्या अब भी जिम्मेदारी तय होगी या मामला ठंडे बस्ते में जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक महीने तक भटकते रहे हाथी को बचाने में सिस्टम विफल रहा। अब क्या उच्चस्तरीय जांच होगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?

सरकार के लिए बड़ा संदेश
यह घटना सिर्फ एक हाथी की मौत नहीं है।
यह वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था, प्रशासनिक समन्वय और बिजली सुरक्षा तंत्र की पोल खोलने वाली घटना है।
अगर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ेगा
और ऐसे कई बेजुबान जानवर सिस्टम की लापरवाही का शिकार होते रहेंगे।


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