विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की बात कही है
नई दिल्ली: दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन अब कथित विवादित नारों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच घिर गया है। विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर कश्मीर और कुछ राजनीतिक व्यक्तियों व संगठनों से जुड़े नारे लिखे जाने के बाद विवाद बढ़ गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की बात कही है। इसी बीच, छात्रों से मिलने पहुंचे कांग्रेस सांसद इमरान मसूद को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया।
छात्रों का कहना है कि उनका मुख्य मुद्दा छात्र संघ की बहाली और चुनाव की तारीख घोषित करना है। वहीं, कथित नारों को लेकर भाजपा और अन्य संगठनों ने सवाल उठाए हैं। इमरान मसूद ने भी विवादित नारों से दूरी बनाते हुए कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इस घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
जामिया की दीवारों पर कथित विवादित नारे, जांच में जुटा प्रशासन
जामिया मिल्लिया इस्लामिया परिसर की दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ जैसे नारे लिखे होने की खबरें सामने आईं। इन नारों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने आपत्ति जताई। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कथित आपत्तिजनक लेखन की निंदा की और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की बात कही। रिपोर्टों के अनुसार, दीवारों से नारे हटा दिए गए हैं। हालांकि, इन्हें किसने लिखा था, इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
प्रदर्शनकारी छात्रों ने इन नारों से अपने आंदोलन को अलग बताया है। उनका आरोप है कि छात्र संघ चुनाव की मांग से ध्यान हटाने के लिए इस तरह का विवाद खड़ा किया जा रहा है। फिलहाल, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर आंदोलन
जामिया में छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर 12 अक्टूबर से आंदोलन चल रहा है। छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय में निर्वाचित छात्र संघ की अनुपस्थिति के कारण विद्यार्थियों को अपनी समस्याएं प्रशासन के सामने सामूहिक रूप से रखने में कठिनाई होती है।
प्रदर्शनकारी छात्रों की प्रमुख मांगें हैं:
- छात्र संघ चुनाव की तारीख घोषित की जाए।
- आंदोलन के दौरान छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई की समीक्षा कर उसे वापस लेने पर विचार किया जाए।
- सिक्योरिटी एडवाइजर और चीफ प्रॉक्टर की भूमिका की समीक्षा करते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग पर फैसला लिया जाए।
छात्रों का कहना है कि छात्र संघ उनकी समस्याओं, शैक्षणिक सुविधाओं और छात्र अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाने का लोकतांत्रिक माध्यम है। इसलिए चुनाव बहाल करने की प्रक्रिया में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं होनी चाहिए।
हाईलेवल कमेटी ने क्या कहा?
विश्वविद्यालय की हाईलेवल कमेटी ने छात्र संघ की बहाली के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने वाली कमेटी गठित किए जाने की जानकारी दी है। प्रशासन का तर्क है कि छात्र संघ का संविधान और चुनाव कराने की प्रक्रिया तय किए बिना चुनाव की तारीख घोषित करना जल्दबाजी होगी। कमेटी ने आंदोलन के दौरान की गई अनुशासनात्मक कार्रवाइयों की समीक्षा का भी उल्लेख किया है। दूसरी तरफ, छात्रों का कहना है कि संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए दो महीने का समय देने से उनकी मुख्य मांग का समाधान नहीं होता, क्योंकि अभी तक चुनाव की निश्चित तारीख सामने नहीं आई है।
13वें दिन भी जारी रही भूख हड़ताल
छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर कुछ विद्यार्थी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। 24 अक्टूबर की रिपोर्टों के अनुसार, भूख हड़ताल 13वें दिन में पहुंच गई थी। छात्र जासिम अली खान ने कहा है कि आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक उनकी मांगों पर ठोस फैसला नहीं होता। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि प्रशासन की ओर से दी गई समयसीमा चुनाव कराने की तारीख नहीं, बल्कि संविधान का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़ी है। वे चाहते हैं कि विश्वविद्यालय चुनाव कराने की स्पष्ट समयसीमा घोषित करे।
ABVP और VHP ने उठाए सवाल
दीवारों पर कथित विवादित नारे लिखे जाने के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के प्रवक्ता विनोद बंसल ने भी इस घटना पर आपत्ति जताई और विश्वविद्यालय प्रशासन से कार्रवाई करने की मांग की। इन संगठनों की प्रतिक्रियाओं के बाद मामला छात्र संघ चुनाव की मांग से आगे बढ़कर राजनीतिक बहस का विषय बन गया। हालांकि, जब तक जांच में जिम्मेदार लोगों की पहचान नहीं होती, तब तक किसी विशेष संगठन या व्यक्ति को नारों के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
गिरिराज सिंह की प्रतिक्रिया से बढ़ी राजनीतिक बहस
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी जामिया में कथित विवादित नारों के मामले पर प्रतिक्रिया दी और शाहीन बाग आंदोलन का जिक्र किया। इस बयान के बाद विवाद को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए। दूसरी ओर, AIMIM की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष डॉ. शोएब जमई ने छात्र आंदोलन को कमजोर करने की कथित कोशिशों पर सवाल उठाए। उन्होंने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया। इन प्रतिक्रियाओं के बीच छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को उनके मूल मुद्दे—छात्र संघ चुनाव—पर जल्द फैसला करना चाहिए।
इमरान मसूद छात्रों से मिलने पहुंचे, पुलिस ने हिरासत में लिया
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद 23 अक्टूबर को जामिया में प्रदर्शनकारी छात्रों से मिलने पहुंचे थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान सांसद समेत कुल 10 लोगों को हिरासत में लिया गया था।
मसूद ने विवादित नारों का समर्थन करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और ऐसे पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उनका आरोप था कि इस तरह की घटनाओं का इस्तेमाल छात्र संघ चुनाव की मांग को कमजोर करने के लिए किया जा सकता है। उनकी हिरासत के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच बयानबाजी तेज हो गई। वहीं, छात्र आंदोलन के समर्थकों ने चुनाव बहाल करने की मांग को मुख्य मुद्दा बनाए रखने पर जोर दिया।
2006 से जामिया में निर्वाचित छात्र संघ नहीं
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आखिरी छात्र संघ चुनाव 2005 में हुए थे। इसके बाद मार्च 2006 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्वाचित छात्र संघ को भंग कर दिया था। तब से छात्र संघ बहाल करने की मांग अलग-अलग समय पर उठती रही है। मौजूदा आंदोलन में छात्र इसी व्यवस्था को फिर से शुरू करने और चुनाव की तारीख घोषित करने पर जोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि छात्र संघ के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी समस्याएं उठाने और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिलता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल जामिया में छात्र संघ चुनाव की मांग, अनुशासनात्मक कार्रवाई और कथित विवादित नारों की जांच तीनों मुद्दे चर्चा में हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने संविधान तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है, जबकि छात्र तत्काल चुनाव की समयसीमा चाहते हैं।
कथित नारों के पीछे कौन था, इस संबंध में जांच के नतीजे सामने आने बाकी हैं। ऐसे में पूरे मामले का अगला चरण विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसलों, पुलिस की जांच और छात्र संगठनों के रुख पर निर्भर करेगा।






















