- Nepal Flood से कई जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं और बिजली उत्पादन पर असर पड़ा।
- मानसून में भारत को बिजली बेचने वाला नेपाल अब भारत से बिजली लेने की स्थिति में आ सकता है।
- आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में सीमा-पार आपदा प्रबंधन और सूचना साझा करने के सवाल उठाए।
- भारत की राहत सहायता ने संकट के समय भारत-नेपाल संबंधों की अहमियत को फिर सामने ला दिया।
काठमांडू: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सैकड़ों लोगों की जिंदगी प्रभावित करने के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्र की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और भारत-नेपाल संबंधों से जुड़े कई अहम सवाल भी सामने ला दिए हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद भारी मलबे के साथ आए जलप्रवाह ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में व्यापक तबाही मचाई। सड़कें, पुल, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं इसकी चपेट में आईं।
इस आपदा का असर नेपाल की बिजली व्यवस्था पर भी पड़ा है। जलविद्युत पर अत्यधिक निर्भर नेपाल में कई परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने के बाद बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है। ऐसे में परिस्थितियां ऐसी बन सकती हैं कि मानसून के दौरान भारत को बिजली बेचने वाला नेपाल खुद भारत से बिजली लेने की स्थिति में पहुंच जाए।
नेपाल की बिजली व्यवस्था को बड़ा झटका
नेपाल की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता करीब 4,300 मेगावाट है और इसमें 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जलविद्युत का है। बाढ़ से करीब 13 जलविद्युत संयंत्रों और एक सौर परियोजना के प्रभावित होने की बात सामने आई है। इससे लगभग 360 मेगावाट उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा।
भारत को बिजली उपलब्ध कराने वाला करीब 14 मेगावाट क्षमता का देविघाट जलविद्युत संयंत्र भी बाढ़ से प्रभावित हुआ। 26 अगस्त को बाढ़ के दिन भारत नेपाल से एक समय में 963.4 मेगावाट तक बिजली ले रहा था। अगले दिन नेपाल से भारत को होने वाली बिजली आपूर्ति में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई। यह स्थिति नेपाल की ऊर्जा व्यवस्था की उस चुनौती को सामने लाती है, जिसमें देश की बिजली आपूर्ति का बड़ा हिस्सा जलविद्युत पर निर्भर है और प्राकृतिक आपदाएं उत्पादन क्षमता को सीधे प्रभावित कर सकती हैं।
अब भारत से बिजली लेने की जरूरत पड़ सकती है
आमतौर पर गर्मियों और मानसून के दौरान नेपाल में जलविद्युत उत्पादन बढ़ने पर भारत नेपाल से बिजली खरीदता है। वहीं सर्दियों में नेपाल का जलविद्युत उत्पादन घटने पर भारत से बिजली आयात की जरूरत पड़ती है।
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लेकिन इस बार बाढ़ ने समीकरण बदल दिए हैं। जलविद्युत परियोजनाओं को हुए नुकसान के कारण नेपाल को मानसून के दौरान भी भारत से बिजली लेने की जरूरत पड़ सकती है। भारत और नेपाल के बीच बिजली के आयात-निर्यात की क्षमता पहले से करीब 1,000 मेगावाट है। दोनों देशों के बीच इसे बढ़ाकर 1,400 मेगावाट से अधिक करने पर भी सहमति बनी है। ऐसे में सीमा पार बिजली व्यापार आपदा के बाद नेपाल के लिए महत्वपूर्ण सहारा बन सकता है।
बाढ़ ने हिमालयी आपदा प्रबंधन पर भी उठाए सवाल
इस आपदा ने भारत, नेपाल और चीन की सीमाओं से जुड़े हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन और सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों में ग्लेशियर के ढहने और भारी मात्रा में मलबे के नदी में आने को जलप्रवाह की बड़ी वजह बताया गया है। इस क्षेत्र में ग्लेशियर, हिमताल और अस्थिर पहाड़ी ढलानों से जुड़ी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बना रहता है।
तिब्बत की ओर संभावित ‘बैरियर लेक’ बनने और उसके टूटने की आशंका ने भी चिंता बढ़ाई। इससे यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि हिमालयी क्षेत्र में सीमा के दोनों ओर होने वाली गतिविधियों, जल संसाधनों और आपदा जोखिमों से जुड़ी सूचनाएं पड़ोसी देशों के बीच कितनी तेजी और पारदर्शिता से साझा की जाती हैं।
संकट के समय भारत की सक्रियता
बाढ़ के बाद भारत की ओर से नेपाल को राहत और मानवीय सहायता उपलब्ध कराने की कोशिशें भी चर्चा में रहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बातचीत कर हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। इसके बाद भारतीय वायुसेना का C-130J विमान हिंडन से काठमांडू पहुंचा और राहत सामग्री तथा जरूरी दवाइयां पहुंचाई गईं। भारत की ओर से 24 घंटे काम करने वाला नियंत्रण कक्ष और हेल्पलाइन भी सक्रिय की गई।

नेपाल में इस सहायता को भारत-नेपाल के पारंपरिक संबंधों के संदर्भ में देखा गया। दोनों देशों के बीच केवल सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय स्तर पर भी गहरे रिश्ते हैं।
भारत-नेपाल रिश्ता सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं
नेपाल और भारत के संबंधों की सबसे बड़ी विशेषता दोनों देशों के बीच खुली सीमा और लोगों के बीच गहरे सामाजिक रिश्ते हैं। व्यापार, रोजगार, धार्मिक यात्राओं और रोजमर्रा की आवाजाही ने दोनों देशों को लंबे समय से एक-दूसरे से जोड़े रखा है। यही वजह है कि किसी प्राकृतिक आपदा के समय दोनों देशों के बीच सहयोग का महत्व केवल आर्थिक नहीं रहता। राहत, बचाव, चिकित्सा सहायता और ऊर्जा सहयोग जैसे क्षेत्र इस रिश्ते की व्यावहारिक अहमियत को सामने लाते हैं।
चीन के साथ संबंधों पर भी नजर
नेपाल के लिए चीन भी एक महत्वपूर्ण पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार है। चीन के साथ नेपाल के बुनियादी ढांचे, व्यापार और कनेक्टिविटी से जुड़े कई महत्वपूर्ण हित हैं।
हालांकि, हिमालयी आपदा के इस घटनाक्रम ने यह बहस जरूर तेज कर दी है कि रणनीतिक साझेदारी का मूल्यांकन केवल निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। आपदा के समय सूचना साझा करने, राहत और मानवीय सहायता तथा सीमा-पार समन्वय की क्षमता भी किसी रिश्ते की वास्तविक मजबूती का महत्वपूर्ण पैमाना हो सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि नेपाल को भारत या चीन में से किसी एक को चुनना चाहिए। काठमांडू की विदेश नीति के लिए दोनों पड़ोसियों के साथ संतुलित संबंध महत्वपूर्ण हैं। लेकिन संकट की घड़ी में कौन कितना प्रभावी और समय पर सहयोग करता है, यह किसी भी देश की रणनीतिक सोच में महत्वपूर्ण कारक बन सकता है।
बाढ़ का बड़ा संदेश
नेपाल की यह त्रासदी केवल प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं है। इसने ऊर्जा सुरक्षा, सीमा-पार आपदा प्रबंधन और पड़ोसी देशों के साथ भरोसे की अहमियत को एक साथ सामने ला दिया है।
नेपाल की बिजली परियोजनाओं को नुकसान ने दिखाया कि जलविद्युत पर अत्यधिक निर्भरता के साथ प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम से निपटने की रणनीति भी जरूरी है। वहीं भारत की राहत और ऊर्जा सहयोग की संभावित भूमिका ने दोनों देशों के संबंधों के व्यावहारिक पक्ष को फिर सामने ला दिया है।
हिमालय की इस आपदा ने एक बात जरूर स्पष्ट की है—संकट के समय पड़ोसी की भूमिका सिर्फ नक्शे पर उसकी दूरी से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि जरूरत पड़ने पर वह कितनी तेजी से आपके साथ खड़ा होता है।

