- Dinesh Sharma लंबे समय तक बीजेपी के संगठन और सरकार दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे
- Dinesh Sharma का राज्यसभा कार्यकाल इस साल नवंबर में समाप्त होने वाला है
लखनऊ: उत्तर प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पार्टी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में शामिल Dinesh Sharma को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है। उनकी नई जिम्मेदारी को सिर्फ एक प्रशासनिक नियुक्ति के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय के बीच बीजेपी के संदेश से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
दिनेश शर्मा लंबे समय तक बीजेपी के संगठन और सरकार दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। वह दो बार लखनऊ के मेयर रह चुके हैं। वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया था। इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। अब सक्रिय राजनीति से इतर उन्हें उपराज्यपाल की जिम्मेदारी मिलने को उनके लंबे राजनीतिक सफर के बाद सम्मानजनक भूमिका के तौर पर देखा जा रहा है।
राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने से पहले मिली नई जिम्मेदारी
दिनेश शर्मा का राज्यसभा कार्यकाल इस साल नवंबर में समाप्त होने वाला है। उससे पहले ही केंद्र की ओर से उन्हें अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल नियुक्त कर दिया गया। बीजेपी के भीतर इसे लेकर एक राजनीतिक गणित की चर्चा भी है। यदि पार्टी उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजती तो केंद्र में मंत्री पद की संभावनाएं भी बन सकती थीं। लेकिन अब उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए किसी दूसरे ब्राह्मण चेहरे को मौका दिए जाने की संभावना बनती है। ऐसे में यह नियुक्ति बीजेपी के लिए एक साथ कई राजनीतिक समीकरण साधने वाली मानी जा रही है।
यूपी चुनाव से पहले ब्राह्मण समुदाय को संदेश?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से बीजेपी के महत्वपूर्ण समर्थक वर्गों में माना जाता रहा है। पिछले चार चुनावों में इस समुदाय का बीजेपी को मजबूत समर्थन मिलने की बात कही जाती रही है। हालांकि पिछले कुछ समय में ब्राह्मण समुदाय के एक हिस्से में प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी को लेकर असंतोष की चर्चाएं भी सामने आई हैं। खास तौर पर सरकार और संगठन में अपनी अपेक्षा के मुताबिक हिस्सेदारी नहीं मिलने की शिकायतों ने राजनीतिक दलों का ध्यान खींचा है। इसी बीच दिनेश शर्मा जैसे वरिष्ठ ब्राह्मण नेता को संवैधानिक पद की जिम्मेदारी देना बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।
UGC गाइडलाइन्स से भी जुड़ा है असंतोष का मुद्दा
ब्राह्मण समुदाय के बीच नाराजगी की चर्चा के दौरान यूजीसी गाइडलाइन्स का मुद्दा भी सामने आया है। इसे लेकर विरोध और आपत्तियों के बीच बीजेपी की ओर से स्थिति स्पष्ट करने के प्रयास किए गए हैं। हाल में बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी उम्मीदवार की हार के कारणों की चर्चा में भी ब्राह्मण मतदाताओं की नाराजगी को एक संभावित वजह के तौर पर बताया गया था। ऐसे राजनीतिक माहौल में बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखना अहम माना जा रहा है।
संगठन में भी ब्राह्मण चेहरों को मिल रही अहमियत
बीजेपी की संगठनात्मक गतिविधियों में भी ब्राह्मण नेताओं की भूमिका बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम में पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है। वहीं शिवानंद द्विवेदी को सोशल मीडिया टीम का सह संयोजक बनाया गया है। इन नियुक्तियों को भी पार्टी के सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब नजरें केंद्र की मोदी मंत्रिपरिषद में संभावित फेरबदल पर भी हैं। उत्तर प्रदेश से किसी ब्राह्मण नेता को कैबिनेट स्तर की जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा है। फिलहाल जितिन प्रसाद केंद्र सरकार में राज्य मंत्री हैं। इससे पहले मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पूर्वी उत्तर प्रदेश से महेंद्र नाथ पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था।
दिनेश शर्मा की नियुक्ति से BJP क्या संदेश देना चाहती है?
दिनेश शर्मा की राजनीतिक पहचान सिर्फ एक वरिष्ठ बीजेपी नेता की नहीं रही है। वह संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहे और सरकार में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले दिनेश शर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी रहे हैं। उनकी राजनीतिक छवि एक सौम्य, निष्ठावान और अपेक्षाकृत विवाद-रहित नेता की रही है। ऐसे नेता को केंद्र शासित प्रदेश का उपराज्यपाल बनाना पार्टी की ओर से यह संदेश देने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है कि वरिष्ठ ब्राह्मण नेताओं को अब भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही हैं।
विपक्ष के PDA दांव के बीच BJP की रणनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की लड़ाई लगातार तेज रही है। विपक्षी दल बीजेपी पर अलग-अलग सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी अपने PDA समीकरण में ‘P’ का अर्थ पंडित बताते हुए ब्राह्मण समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर चुके हैं। ऐसे समय में बीजेपी के एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे को उपराज्यपाल जैसी संवैधानिक जिम्मेदारी मिलना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इससे पार्टी ब्राह्मण समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि उसके वरिष्ठ नेताओं को संगठन और सरकार में लगातार सम्मानजनक जिम्मेदारियां मिल रही हैं।
ब्रजेश पाठक के हाथ में ब्राह्मण समुदाय से संवाद की जिम्मेदारी
उत्तर प्रदेश में फिलहाल ब्राह्मण समुदाय के साथ संवाद कायम रखने में उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की भूमिका महत्वपूर्ण है। आरक्षण को लेकर आंदोलन कर रहे लोगों से उन्होंने लखनऊ में मुलाकात भी की थी। बताया गया कि उन्होंने आंदोलनकारियों को आश्वासन दिया था कि उनकी मुलाकात जल्द किसी बड़े केंद्रीय मंत्री से कराई जाएगी। इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने दिल्ली में इन आंदोलनकारियों से मुलाकात की थी। बीजेपी की ओर से यूजीसी गाइडलाइन्स पर भी दोबारा विचार किए जाने का भरोसा देने की बात सामने आई है। पार्टी की ओर से यही बात सुप्रीम कोर्ट में भी कही गई थी।
क्या बीजेपी नाराज ब्राह्मण वोटरों को फिर साध पाएगी?
दिनेश शर्मा की नई जिम्मेदारी, संगठन में ब्राह्मण नेताओं को मिली भूमिकाएं और समुदाय से जुड़े मुद्दों पर बीजेपी की सक्रियता को एक व्यापक राजनीतिक रणनीति के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। बीजेपी के सामने चुनौती अपने पारंपरिक ब्राह्मण समर्थन को बनाए रखने की है। पार्टी को उम्मीद है कि प्रतिनिधित्व और सम्मान से जुड़े सवालों को संबोधित करके समुदाय की नाराजगी कम की जा सकती है। वहीं राजनीतिक विश्लेषण का एक पक्ष यह भी मानता है कि ब्राह्मण समुदाय के सामने बीजेपी के अलावा विकल्प सीमित हैं। ऐसे में पार्टी इस सामाजिक आधार को अपने साथ बनाए रखने के लिए संगठन, सरकार और संवैधानिक पदों पर प्रतिनिधित्व का संतुलन साधने की कोशिश कर रही है।
दिनेश शर्मा की अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल के रूप में नियुक्ति इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का एक अहम हिस्सा मानी जा रही है।

