नई दिल्ली। भारत को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की अहम भूमिका है। लेकिन जमीन अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरियों और राज्य स्तर की अनुमतियों में देरी के कारण कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स निर्माण शुरू होने से पहले ही अटके हुए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, केंद्रीय लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की अनुमानित लागत में करीब 3 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है।
केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ इन समस्याओं को साझा करते हुए परियोजनाओं में तेजी लाने की जरूरत पर जोर दिया है। मुख्य सचिवों के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन में भी लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा प्रस्तावित है।

75% देरी के पीछे चार बड़ी वजहें
PRAGATI प्लेटफॉर्म के जरिए किए गए विश्लेषण के अनुसार, परियोजनाओं में होने वाली लगभग 75 प्रतिशत देरी निर्माण-पूर्व चरण की चार प्रमुख समस्याओं से जुड़ी है। इनमें जमीन अधिग्रहण या राइट ऑफ वे, पर्यावरणीय मंजूरियां, यूटिलिटी शिफ्टिंग और राज्य स्तर की अनुमतियां शामिल हैं।
इन प्रक्रियाओं के समय पर पूरा नहीं होने से निर्माण कार्य शुरू करने में देरी होती है। इसका असर परियोजनाओं की कुल लागत, समयसीमा और आर्थिक लाभ पर भी पड़ता है।
जमीन अधिग्रहण सबसे बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, जमीन अधिग्रहण परियोजनाओं में देरी की सबसे बड़ी वजह है। देरी के कुल कारणों में इसकी हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत बताई गई है। सड़क, रेलवे और अन्य रैखिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए बड़े भूभाग की जरूरत होती है। जमीन उपलब्ध कराने और राइट ऑफ वे से जुड़े मामलों का समय पर निपटारा नहीं होने पर निर्माण कार्य प्रभावित होता है।
पर्यावरणीय मंजूरियों में लग रहा लंबा समय
इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को वन, वन्यजीव और पर्यावरण से संबंधित मंजूरियां भी लेनी पड़ती हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वन मंजूरी की प्रक्रिया के लिए 150 दिनों का समय निर्धारित है, लेकिन कई मामलों में इसमें 500 दिनों से अधिक लग रहे हैं।
इसी तरह वन्यजीव मंजूरी में लगभग डेढ़ से साढ़े तीन साल तक का समय लग सकता है। पर्यावरणीय मंजूरियों की प्रक्रिया में भी 180 दिनों से लेकर ढाई साल तक लगने की जानकारी दी गई है। इन प्रक्रियाओं में देरी से परियोजनाओं की शुरुआत टल सकती है और निर्माण की लागत बढ़ सकती है। हालांकि, मंजूरी की वास्तविक अवधि परियोजना की प्रकृति और संबंधित नियमों पर निर्भर करती है।
यूटिलिटी शिफ्टिंग और परमिट भी बड़ी बाधा
सड़क या रेलवे परियोजनाओं के रास्ते में आने वाली बिजली की लाइनें, पानी की पाइपलाइन और अन्य उपयोगिता ढांचों को स्थानांतरित करना भी चुनौती बना हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, यूटिलिटी शिफ्टिंग में औसतन 500 से 600 दिन लग रहे हैं, जबकि इसके लिए 200 से 300 दिनों का समय निर्धारित था। इसके अलावा, सिंगल विंडो सिस्टम की कमी के कारण केंद्रीय लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के विकासकर्ताओं को 16 अलग-अलग राज्य एजेंसियों से 22 प्रकार की मंजूरियां या परमिट लेने पड़ सकते हैं। कई एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी से परियोजनाओं की प्रक्रिया और लंबी हो जाती है।
जमीन अधिग्रहण में हरियाणा सबसे आगे
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की ओर से राज्यों की भूमि अधिग्रहण दक्षता पर जारी रैंकिंग में हरियाणा को सबसे ऊपर बताया गया है।
| राज्य | भूमि अधिग्रहण दक्षता स्कोर |
|---|---|
| हरियाणा | 75.8 |
| मध्य प्रदेश | 66.2 |
| राजस्थान | 65.9 |
| आंध्र प्रदेश | 63.8 |
| छत्तीसगढ़ | 63.0 |
| केरल | 63.0 |
| तमिलनाडु | 45.4 |
| महाराष्ट्र | 43.6 |
| गुजरात | 30.5 |
इन आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा 75.8 के स्कोर के साथ सूची में सबसे ऊपर है, जबकि गुजरात का स्कोर 30.5 बताया गया है। यह रैंकिंग भूमि अधिग्रहण दक्षता से संबंधित है, इसे राज्यों के समग्र विकास या सभी प्रकार की परियोजनाओं के प्रदर्शन की रैंकिंग नहीं समझना चाहिए।
2047 के आर्थिक लक्ष्य के लिए क्यों जरूरी हैं ये परियोजनाएं?
सड़क, रेलवे और अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से माल ढुलाई की लागत कम करने, बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने में मदद मिल सकती है। लेकिन परियोजनाओं में देरी होने पर इन लाभों को हासिल करने में भी अधिक समय लगता है। निर्माण-पूर्व प्रक्रियाओं में सुधार, केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, समय पर भूमि उपलब्ध कराना और मंजूरियों की निगरानी करना परियोजनाओं को गति देने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार अहम है। ऐसे में जमीन अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी और राज्य स्तर के परमिट से जुड़ी बाधाओं को दूर करना जरूरी होगा, ताकि परियोजनाएं समय पर पूरी हों और लागत में अनावश्यक बढ़ोतरी को कम किया जा सके।
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