अगर आपको लगता है कि हॉरर सिर्फ खून-खराबे और डरावने चेहरों से बनता है, तो 1993 की मलयालम फिल्म मणिचित्राथजु आपकी सोच बदल देगी। यह फिल्म डराने के बजाय आपके दिमाग में ऐसा खौफ पैदा करती है, जो लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ता
ST.News Desk
एक प्राचीन हवेली, बंद दरवाजे और बरसों से छिपा एक खौफनाक राज—मणिचित्राथजु की कहानी यहीं से शुरू होती है। फिल्म में नकुलन (सुरेश गोपी) अपनी पत्नी गंगा (शोभना) के साथ केरल स्थित अपने पुश्तैनी घर ‘मादम्पल्ली थरावड़’ लौटता है। परिवार उन्हें चेतावनी देता है कि हवेली का एक हिस्सा श्रापित है, जहां ‘नागवल्ली’ नाम की नर्तकी की आत्मा कैद है।
तार्किक सोच रखने वाली गंगा इन बातों को अंधविश्वास मानती है और उस बंद कमरे का ताला खोल देती है। इसके बाद शुरू होता है रहस्यमयी घटनाओं का सिलसिला—घुंघरुओं की आवाज, टूटती चीजें और अजीब हरकतें। शक घर के ही लोगों पर जाता है, लेकिन सच्चाई क्या है, यह समझना आसान नहीं।
इस रहस्य को सुलझाने के लिए नकुलन अपने दोस्त और मनोचिकित्सक डॉ. सनी जोसेफ (मोहनलाल) को बुलाता है। फिल्म यहीं से एक दिलचस्प मोड़ लेती है, जहां यह सवाल खड़ा होता है—क्या यह वाकई कोई प्रेत है या इंसानी दिमाग का खेल?
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका दमदार अभिनय है। गंगा के किरदार में शोभना का ट्रांसफॉर्मेशन इतना प्रभावशाली है कि उन्होंने इसके लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता। वहीं मोहनलाल ने अपने किरदार में हास्य और गंभीरता का बेहतरीन संतुलन पेश किया है। सुरेश गोपी के साथ-साथ थिलकन और नेदुमुदी वेणु जैसे कलाकारों ने भी फिल्म को मजबूती दी है।
IMDb पर 8.8/10 की शानदार रेटिंग के साथ यह फिल्म आज भी एक कल्ट क्लासिक मानी जाती है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसे हिंदी में भूल भुलैया, तमिल में ‘चंद्रमुखी’ और कन्नड़ में ‘आप्तमित्रा’ के रूप में रीमेक किया गया, लेकिन मूल फिल्म की गहराई और खौफ को दोहराना आसान नहीं रहा।
निर्देशक फाजिल और लेखक मधु मुट्टम ने मिलकर एक ऐसी कहानी रची है, जहां मनोविज्ञान और अलौकिक तत्वों की रेखा धुंधली हो जाती है। शानदार संगीत, बैकग्राउंड स्कोर और सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म को एक यादगार अनुभव बनाते हैं।
अगर आप सस्पेंस और साइकोलॉजिकल हॉरर के शौकीन हैं, तो मणिचित्राथजु आपकी वॉचलिस्ट में जरूर होनी चाहिए। यह फिल्म जियो हॉटस्टार और प्राइम वीडियो जैसे प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

