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बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत, क्या 2026 बना नया राजनीतिक टर्निंग प्वाइंट?

Posted on May 7, 2026May 7, 2026 By Chhavi Singh

92% मतदान, 15% वोट शिफ्ट और बदली राजनीतिक धुरी; क्या खत्म हुआ ममता युग?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को अब सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल माना जा रहा है। बीजेपी ने जिस तरह तृणमूल कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए ऐतिहासिक जीत दर्ज की, उसने बंगाल की दशकों पुरानी राजनीतिक धारणाओं को झकझोर दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात रही 92 प्रतिशत से अधिक मतदान और करीब 15 प्रतिशत वोटरों का राजनीतिक रुख बदलना। यही वजह है कि कई राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव को “क्रिटिकल इलेक्शन” यानी राजनीतिक दिशा बदल देने वाला चुनाव बता रहे हैं

ST.News Desk

2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को लगभग 48 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी 38 प्रतिशत पर थी। लेकिन 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। बीजेपी 45.84 प्रतिशत वोट शेयर के साथ तृणमूल के 41.08 प्रतिशत से करीब पांच प्रतिशत आगे निकल गई। यानी कुल मिलाकर आठ प्रतिशत से ज्यादा का बड़ा स्विंग देखने को मिला। इतनी बड़ी वोट शिफ्ट सामान्य राजनीतिक बदलाव नहीं मानी जाती।

विश्लेषकों का मानना है कि इस परिणाम को सिर्फ SIR जैसे मुद्दों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ तेज एंटी-इंकंबेंसी, बीजेपी-आरएसएस की बूथ स्तर तक पहुंची रणनीति और हिंदुत्व आधारित वोटों के व्यापक ध्रुवीकरण ने मिलकर यह माहौल बनाया। अगर SIR का प्रभाव कुछ प्रतिशत मान भी लिया जाए, तब भी 92 प्रतिशत मतदान के बीच 15 प्रतिशत वोट शिफ्ट को ऐतिहासिक माना जाएगा।

बंगाल की राजनीति हमेशा भावनाओं, पहचान और वैचारिक संघर्षों से जुड़ी रही है। यहां चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक सोच का प्रतिबिंब माने जाते हैं। 2026 का चुनाव भी वैसा ही दिखा, जहां लोग सिर्फ सरकार चुनने नहीं, बल्कि अपने भविष्य, सुरक्षा, पहचान और राजनीतिक दिशा का फैसला करने मतदान केंद्रों तक पहुंचे।

राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो बंगाल में इससे पहले दो चुनावों ने सत्ता और राजनीति की दिशा पूरी तरह बदल दी थी। पहला 1977, जब कांग्रेस का लंबे समय का प्रभुत्व खत्म हुआ और ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया। दूसरा 2011, जब ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने लेफ्ट शासन को उखाड़कर तृणमूल युग की शुरुआत की। अब 2026 को उसी श्रेणी का तीसरा बड़ा मोड़ माना जा रहा है।

1977 के चुनाव ने बंगाल की राजनीति को वर्ग संघर्ष और वैचारिक राजनीति की दिशा दी थी। वहीं 2011 में ममता बनर्जी ने आक्रामक क्षेत्रीय राजनीति और “मां-माटी-मानुष” के नारे के सहारे सत्ता हासिल की। लेकिन 2026 में बीजेपी ने “हिंदुत्व आधारित राजनीतिक एकजुटता” के जरिए तृणमूल की “बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी” राजनीति को चुनौती देते हुए निर्णायक बढ़त बना ली।

इस चुनाव में तीन बड़े संकेत साफ दिखाई दिए। पहला, अलग-अलग सामाजिक वर्गों और क्षेत्रों की राजनीतिक निष्ठाएं तेजी से बदलीं। दूसरा, चुनावी समीकरणों में स्थायी बदलाव के संकेत मिले। और तीसरा, रिकॉर्ड मतदान ने यह साबित कर दिया कि मतदाता इस चुनाव को अपने भविष्य से जोड़कर देख रहे थे।

बीजेपी की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने असंतोष को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदल दिया। वहीं तृणमूल कांग्रेस की वह पकड़, जिसे लंबे समय तक अजेय माना जाता था, कमजोर पड़ती दिखाई दी। यही वजह है कि 2026 का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक पुनर्गठन जैसा महसूस हुआ।

अब राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज है कि क्या 2026 वास्तव में बंगाल में नए राजनीतिक युग की शुरुआत है। अगर 1977 ने कांग्रेस युग खत्म किया और 2011 ने वामपंथी दौर को समाप्त किया, तो 2026 शायद तृणमूल प्रभुत्व के अंत और बीजेपी के नए दौर की शुरुआत के रूप में दर्ज हो सकता है।

बंगाल के मतदाताओं ने इस चुनाव के जरिए यह भी दिखाया कि राज्य में राजनीतिक निष्ठाएं स्थायी नहीं हैं। जब जनता की उम्मीदें बदलती हैं, तब चुनाव सिर्फ सरकार नहीं बदलते, बल्कि आने वाले दशक की राजनीति की दिशा भी तय कर देते हैं।

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